अंकल ने कहा – सफेद दाग छुपा लो…” एक मुलाक़ात जो सोच बदल देती है

हर सुबह की तरह…
मैं हाथरस से मथुरा जाने वाली ट्रेन पकड़ने स्टेशन जाता हूँ।
भीड़ वही होती है,
प्लेटफॉर्म वही…
लेकिन कुछ चेहरे रोज़ दिखते हैं।

वहीं एक बुजुर्ग अंकल हैं —
करीब सत्तर साल के।
उनके शरीर पर भी सफेद दाग हैं।

हाथ में एक छड़ी,
कंधे पर एक झोला,
साथ में चाय का थर्मस और कुछ कप।

वह रोज़ टहलने आते हैं…
गरीबों को चाय और बिस्कुट देते हैं,
और कुछ भूखे कुत्तों को भी खाना खिलाते हैं।

इतनी उम्र में भी
इतना करुणा भरा दिल…

स्टेशन पर बंदरों का आतंक है,
इसलिए वह छड़ी रखते हैं —
जैसे ज़िंदगी से रोज़ लड़ रहे हों।


एक दिन की बातचीत

एक दिन उन्होंने मुझे टोका…

“बेटा… अपने सफेद दाग पर ब्राउन कलर लगाया करो।”

मैं चुप रह गया…
समझ नहीं आया क्या जवाब दूँ।

फिर उन्होंने कहा —
“जब हम बाल रंगते हैं, तो इसे क्यों नहीं रंग सकते?”

मैंने बस इतना कहा —
“अंकल… ऐसे ही सही है, इसकी कोई ज़रूरत नहीं।”

वह थोड़े गुस्से में कुछ बोलते हुए वहाँ से चले गए…
और मैं वहीं खड़ा रह गया —
एक सवाल के साथ।


छुपाना या स्वीकार करना?

शायद वह गलत नहीं थे…
उन्होंने पूरी ज़िंदगी सफेद दाग छुपाकर जी है।

छुपाना उनके लिए सुरक्षा था,
और स्वीकार करना मेरे लिए ताक़त

वह मुझे बदलना नहीं चाहते थे…
वह मुझे उस दर्द से बचाना चाहते थे
जो उन्होंने खुद झेला था।


असली लड़ाई त्वचा से नहीं, सोच से है

सफेद दाग की सबसे बड़ी लड़ाई
त्वचा से नहीं…
सोच से होती है।

एक पीढ़ी ने इसे छुपाकर जीना सीखा,
दूसरी पीढ़ी इसे स्वीकार कर आत्मविश्वास से जीना सीख रही है।


बदलती सोच की ओर एक कदम

इसी सोच को बदलने के लिए
Vitiligo Support India
हर दिन काम कर रहा है।

जहाँ सफेद दाग
छुपाने की चीज़ नहीं,
स्वीकार करने की पहचान है।


अगर आप भी सफेद दाग के साथ जी रहे हैं…
तो याद रखिए —

आप अकेले नहीं हैं।
Vitiligo Support India आपके साथ है।

“रंग से नहीं, सोच से फर्क पड़ता है।”

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