उत्तर प्रदेश में सफ़ेद दाग़ को किन-किन नामों से जाना जाता है?
Vitiligo Support India – Awareness Series
उत्तर प्रदेश की धरती जितनी विविध है,
उसकी बोलियाँ भी उतनी ही रंग-बिरंगी हैं।
इसी विविधता के कारण एक ही रोग — सफ़ेद दाग़ (Vitiligo) —
राज्य के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग नामों से पहचाना जाता है।
नमस्कार दोस्तों,
आप देख रहे हैं Vitiligo Support India,
जहाँ हम बात करते हैं — समझ, स्वीकार और जागरूकता की।
आज हम जानेंगे कि यूपी में सफ़ेद दाग़ को लोग किन-किन नामों से बुलाते हैं,
और कैसे हर नाम अपने साथ एक सामाजिक कहानी लेकर चलता है।
🔸 पूर्वांचल — “फुलवा”, “फुल्ली”, “फुलहा”
(गोरखपुर, बनारस, बलिया, देवरिया, आज़मगढ़)
पूर्वांचल की गलियों में सफ़ेद दाग़ को सबसे ज़्यादा
“फुलवा” या “फुल्ली” कहा जाता है।
यह नाम इसलिए पड़ा क्योंकि दाग़ फूल की तरह फैलते या खिलते दिखते थे।
लेकिन यहाँ एक बड़ा भ्रम भी है —
कई लोग इसे बरसात, खाने या छूने से जोड़ते हैं।
सच:
“फुलवा कोई छूत की बीमारी नहीं है,
यह शरीर के भीतर की प्रक्रिया का परिणाम है।”
डर मिटाने के लिए यह कहना बहुत ज़रूरी है।
🔸 अवध क्षेत्र — “फुलई”, “चिट्टा रोग”, “रंग छूटना”
(लखनऊ, अयोध्या, बाराबंकी, रायबरेली, सुल्तानपुर)
अवध में सफेद दाग़ को अक्सर “फुलई” या “चिट्टा रोग” कहा जाता है।
यहाँ अब भी कई लोग सोचते हैं कि यह छूने से फैलता है।
लेकिन दोस्तों —
“सफ़ेद दाग़ छूत का नहीं, सोच का रोग है।”
यह इम्यून सिस्टम का असंतुलन है, न कोई संक्रमण।
अच्छी बात यह है कि शहरों में जागरूकता तेज़ी से बढ़ रही है।
🔸 ब्रज क्षेत्र — “छूट”, “छूआ रोग”, “फुलवा”
(मथुरा, आगरा, अलीगढ़, एटा)
ब्रजभूमि में कई जगह इसे “छूट” या “छूआ रोग” कहते हैं।
यह नाम इसलिए आया क्योंकि लोग मानते थे कि यह स्पर्श से फैलता है।
जबकि विज्ञान और आयुर्वेद दोनों कहते हैं —
“रोग नहीं फैलता, लेकिन गलतफहमी फैल जाती है।”
🔸 बुंदेलखंड — “बरस रोग”, “फूलवां”, “दाग रोग”
(झाँसी, बाँदा, हमीरपुर, चित्रकूट)
यहाँ लोग इसे “बरस रोग” भी कहते हैं,
क्योंकि उन्हें लगता था कि यह बरसात में बढ़ता है।
सच यह है —
यह मौसम से प्रभावित नहीं होता,
बस धूप या गर्मी में दाग़ ज़्यादा दिखाई दे सकते हैं।
“बरस हो या धूप — फर्क समझ से पड़ता है।”
🔸 तराई क्षेत्र — “फुलिया”, “चिट्टा दाग”, “बरसात का दाग”
(लखीमपुर, बहराइच, श्रावस्ती, पीलीभीत)
तराई इलाके में लोग आज भी कहते हैं:
“पानी बदल गया, रंग भी बदल गया।”
लेकिन वास्तविकता यह है —
रंग नहीं, मेलेनोसाइट्स बदलते हैं।
यह शरीर की प्रक्रिया है, ईश्वर की सज़ा नहीं।
🔸 मध्य उत्तर प्रदेश — “फुलका”, “फुलवा”, “रंग उड़ जाना”
(कानपुर, फतेहपुर, इटावा, उन्नाव)
यहाँ एक शब्द बहुत मार्मिक है — “रंग उड़ जाना”।
इसमें उस दर्द की झलक है
जब लोग समझ नहीं पाते कि किसी का रंग क्यों बदल गया।
लेकिन याद रखिए —
“रंग उड़ता है त्वचा का, आत्मा का नहीं।”
🌿 नाम बदलते हैं… सच्चाई नहीं
गोरखपुर में “फुलवा”,
लखनऊ में “फुलई”,
मथुरा में “छूट”,
झाँसी में “बरस रोग”,
लखीमपुर में “फुलिया”…
नाम बदलते गए,
पर सच्चाई वही रही —
यह न छूत है, न पाप है।
यह सिर्फ़ त्वचा का परिवर्तन है।
Vitiligo Support India का संदेश है —
रोग नहीं, दृष्टिकोण बदलिए।
समाज में स्वीकृति बढ़ाइए।
अगर आपके आस-पास कोई व्यक्ति सफेद दाग़ से गुजर रहा है,
तो उसे दूर न करें — उसका साथ दें।
क्योंकि बदलाव वहीं से शुरू होता है
जहाँ समझ जन्म लेती है।
कहीं इसे श्वित्र कहते हैं, ग्रंथों के ज्ञान में,
कहीं फूलचंदिया बोलते हैं गाँव की ज़ुबान में।
कानपुर में कोई कहे — “अरे ये तो फुलवा रोग है”,
जौनपुर में सुनाई दे — “भगवान की मर्जी होगी बेटा, धैर्य रखो।”
लखनऊ में कोई फुसफुसाए — “रंग उड़ा है इसका”,
गोरखपुर में बोले — “छूत लाग गइल बा।”
बनारस के घाटों पर कोई बाबा समझाए —
“देह के मेल से ना, मन के मेल से निकलत है ई दाग।”
फ़ैज़ाबाद की अम्मा कहें —
“नय बेटा, भगवान का खेल है, दुख ना मान।”
पर क्या नाम बदल जाने से रंग लौट आता है?
क्या शब्दों की सुई से दिल के घाव भर पाते हैं?
नहीं…
ये दाग़ शरीर पर नहीं,
समाज की सोच पर हैं।
कभी फूलचंदिया, कभी फुलवा, कभी दाग़ कहा,
पर सच्चाई यही — ये बस एक रंग का जाना था,
आत्मा तो आज भी उतनी ही उजली है।
रंग बदल सकता है,
पर इंसान नहीं बदलता।
उसके भीतर का उजाला हमेशा वैसा ही रहता है।
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