बरस / बरसात का दाग़ – लोक मान्यता का नाम
by Ravindra Jaisवाल | Vitiligo Support India
गाँवों में एक बहुत आम बात सुनने को मिलती है —
“बरस लग गया” या “बरसात का दाग़ है।”
यह नाम पीढ़ियों से चला आया है,
लेकिन इसकी जड़ें विज्ञान नहीं, लोकमान्यता में हैं।
बरसात और सफेद दाग़ का संबंध — एक पुरानी गलतफहमी
पुराने समय में लोगों को लगता था कि बारिश का पानी,
नमी, या मौसम के बदलाव से त्वचा पर सफेद निशान उभर जाते हैं।
इसलिए हर सफेद धब्बे को “बरस का दाग़” कहा जाने लगा।
लेकिन आधुनिक चिकित्सा और आयुर्वेद दोनों बताते हैं—
बरसात का विटिलिगो से कोई संबंध नहीं।
✔ यह मौसम से नहीं होता
✔ यह पानी से नहीं फैलता
✔ यह छूत का रोग बिल्कुल भी नहीं है
यह रोग शरीर के अंदर — इम्यून सिस्टम की गड़बड़ी से उत्पन्न होता है,
बाहर के वातावरण से नहीं।
यह नाम हमें क्या सिखाता है?
“बरस का दाग़” एक उदाहरण है कि
जब ज्ञान नहीं होता तो भ्रम ही परंपरा बन जाता है।
समाज ने इसे वर्षों तक मौसम का प्रभाव समझा,
जबकि यह एक autoimmune pigment disorder है।
आज आवश्यकता है परंपरा मिटाने की नहीं,
बल्कि उसे सही अर्थ देने की —
बरस पानी का नहीं,
बरस ज्ञान का होना चाहिए।
मैं हूँ रविन्द्र जायसवाल,
और आप देख रहे हैं Vitiligo Support India Channel।
हमारा संदेश —
“रंग नहीं, सोच बदलिए।”
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