सफ़ेद दाग़ / फुलवा – आम हिंदी नाम
नमस्कार दोस्तों,
आज हम बात करेंगे उस नाम की,
जो भारत के हर कोने में सुना जाता है —
“सफ़ेद दाग़” या “फुलवा”।
ये नाम जितने साधारण लगते हैं,
उतने ही गहरे भ्रम भी साथ लेकर चलते हैं।
लोग सोचते हैं कि यह छूत की बीमारी है…
लेकिन सच्चाई बिल्कुल उलट है।
यह पूरी तरह असंक्रामक (non-contagious) है —
न हवा से फैलता है,
न पानी से,
न छूने से।
यह सिर्फ रंग का बदलाव है, बीमारी का प्रसार नहीं।
“फुलवा” शब्द ग्रामीण इलाकों में इसलिए प्रचलित हुआ,
क्योंकि ये पैचेज़ फूलों की तरह फैले हुए लगते थे।
पर सोचिए…
क्या यह फूलना सिर्फ डर का कारण है?
या यह सुंदरता के नए अर्थ को जन्म दे सकता है?
समस्या नाम में नहीं,
नाम से जुड़े डर में है।
और डर हमेशा ज्ञान से मिटता है।
समाज जब किसी रंग से डरने लगता है,
तो उसे शिक्षा और संवेदना के रंग से रंगने की ज़रूरत होती है।
सफ़ेद दाग़ कोई दोष नहीं —
यह एक अनुभव है।
एक यात्रा है आत्मस्वीकृति, साहस, और खुद से प्यार की।
फुलवा हमें याद दिलाता है कि —
फूलों की तरह खुद पर गर्व करें,
चाहे हमारा रंग कोई भी क्यों न हो।
मैं हूँ रविन्द्र जायसवाल, और आप देख रहे हैं
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हमारा संदेश हमेशा की तरह —
“रंग नहीं, सोच बदलिए।” 🌼
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